"क्रांति मधेश की जरुरत हैं"
डाँ. केशव अर्विन्द प्रवक्ता, मधेशी क्रांतिकारी पार्टी क्रांति मधेश की जरूरत है। मधेश की गुलामी सदियों पुरानी है। गुलामो की मानसिकता भी गुलामी वाली हो जाती है। आमतौर पर सभी मधेशी नेता मानते है कि आजादी के बिना मधेशियो की समस्याओं का समाधान नही हो सकता परन्तु राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय कारणों से वे खु

२०७५ जेठ २६ शनिबार, बिहान ८:५१ बजे३ मिनेट पढाइ

डाँ. केशव अर्विन्द
प्रवक्ता, मधेशी क्रांतिकारी पार्टी
क्रांति मधेश की जरूरत है। मधेश की गुलामी सदियों पुरानी है। गुलामो की मानसिकता भी गुलामी वाली हो जाती है। आमतौर पर सभी मधेशी नेता मानते है कि आजादी के बिना मधेशियो की समस्याओं का समाधान नही हो सकता परन्तु राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय कारणों से वे खुलकर यह बात बोल भी नही सकते है।एक भय चाहे उनके भविष्य का हो या राज्यसत्ता का या अंतरराष्ट्रीय कारकों का, उनके दिमाग मे घूमता रहता है। यह मानसिक गुलामी का ही परिचायक है। यह भय उनमें तब तक बना रहेगा जब तक वे अपने मास्टर की भाषा बोलते रहेंगे। जिस दिन गुलाम अपनी आवाज में अपनी बात रखेगा वह सदा के लिए आजाद हो जाएगा।
मधेशी नेताओ का एक बड़ा योगदान मधेशियो में अपने अधिकारों के लिए चेतना जगाने का है। भले ही इस आड़ में उन्होंने जनमत का दुरुपयोग किया। आजादी की मांग भले ही वे न कर पाए परन्तु उन्होंने सोए मधेशियो को जगाया जरूर।
अब हमें आजादी ही क्यो चाहिए इस पर विभिन्न लेखकों ने कई किलोमीटर कागज को काला कर रखा है कि कैसे नेपालियों ने मधेशियो के साथ हर क्षेत्र में कैसा वर्ताव किया है।मधेशियो को हर क्षेत्र में रोक दिया गया। वास्तव में नेपाल कभी देश बन ही नही सका।एक जातीय सभ्यता ,संस्कृति ,भाषा और वेशभूषा मधेशियो पर जबरन थोपे गए।
सदियों तक किसी के साथ ऐसा व्यवहार कर कोई मूर्ख ही किसी के साथ रहने की अपेक्षा कर सकता है।नेपालियों की सोच में यह बात घुस चुकी है कि मधेशी स्वतंत्र होने की चाह रखते है। यह मधेश के लिए शुभ संकेत है। अब जाहिर है कि ऐसे तो वे आपको आजादी देंगे नही।पहली बात रोड पर या सामाजिक संजाल पर आजादी के नारे लगाने से ये लोग कुछ नही देंगे। मधेश में संघीयता और सीमांकन आदि के आंदोलन इसके ज्वलंत उदाहरण है।खाया पिया कुछ नही प्लेट तोड़ा बारह आने का। सिर्फ हमारे अपने लोगो के सीने में गोली लगी।इन्ही शहादतों की मार्केटिंग कर कुछ लोग मंत्री,सांसद विधायक बन गए।ऐसे आंदोलन में शासको का चरित्र यह है तो आजादी के शांतिपूर्ण आंदोलनों में शासक क्या दमन करेंगे यह गौर करने की बात है।
अंतर्राष्ट्रीय जगत के दो मजबूत खिलाड़ी मधेश की स्वतंत्रता को तब तक मान्यता नही देंगे जब तक हम युद्ध मे नेपालियों की सत्ता को उखाड़ न फेके। ऐसे क्रूर और आततायी मानसिकता वाले शासको से निपटने के लिए हथियार ही एकमात्र सटीक विकल्प है। शांतिपूर्ण आंदोलन का अपना अलग महत्व और फायदे है परन्तु नेपाल के सभी परिवर्तनों में बंदूक की बड़ी भूमिका होती है।इतिहास इसका गवाह है। हमे भी हथियार उठाना पड़ेगा।जब तक आप शक्तिशाली नही है तब तक कोई आपको नोटिस नही लेगा।
अन्याय के विरुद्ध न्यूनतम हिंसा की वकालत गांधी जी ने भी की है।मंडेला खुद अपनी फौज के नेतृत्व कर्ता थे। अमेरिका में जार्ज वाशिंगटन ने बाकायदा ब्रितानियों को पराजित कर स्वतंत्रता ली थीं ।अगर हर घर से एक युवा मधेश के लिए हथियार उठा ले तो 2 साल के भीतर हम आजादी की सांस ले सकते है।मधेशी क्रान्तिकारी पार्टी नाहक खून बहाने में विश्वास नही करती लेकिन आजादी खून ही मांग रही है तो यही सही।
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