मिथिला परिक्रमा के पराक्रम से होली महोत्सब की और यात्रा ...
और राज्य के चारो और नदी–नाला आदी अनेकौ स्मृतिया प्रमाण के रुप में आज भी मौजूद हैं ।
२०७६ फागुन २२ बिहीबार, दिउँसो १२:४८ बजे२० मिनेट पढाइ

परापूर्व काल से मिथिलाञ्चल के भूमी ऋषी–मनीषी और साधु–सन्तो का तपस्थली होता आ रहा हैं । इसी पवित्र भूमी पर अष्टावक्र जैसा सांख्योगी, राजर्षी जनक जैसा कर्मयोगी पैदा हुऐ ।
जिसने अपने योग बल से अनेकौ बुद्ध पुरुष और बुद्धत्व के पिपासु जिज्ञासु को अपनी अन्र्तपथ पर चलने में मार्गदर्शन किया हैं । । राजर्षी जनक अपने पुत्री सिता के विवाह उत्सब के स्वयंवर में धनुष यज्ञ के बहाने इसी भूमी पर उस समय के लगभग सभी ऋषी–मुनी, साधु–सन्त को एक साथ करके महाकुम्भ लगा दिया था ।
जिस से यह मिथिला के भूमी और–और पवित्र होता गया । आज भी जनकपुरधाम के रुप रेखा अनादी काल के आध्यात्मिक तपस्थली (आश्रम) की पहिचान दे रहे हैं । जहाँ अनन्त ताल–तलैया, मठ–मन्दिर और राज्य के चारो और नदी–नाला आदी अनेकौ स्मृतिया प्रमाण के रुप में आज भी मौजूद हैं ।
आध्यात्मिक अभियन्ता
इतिहास के मुताबिक मिथिला राज्य की चार किला; पूर्व में कोशी नदी, दक्षिण और पश्चिम में गंगा नदी के साथ उत्तर दिशा में कमला नदी और पहाड के इलाका सामिल थें । इसी राज्य में अष्टाबक्र, बुद्ध, महाविर, राजर्षी जनक, कपिल, कनात, आज्ञवल्कय, गार्गी और मैत्रेय जैसा अनेक बुद्ध पुरुष अपनी–अपनी अलख जगाया । जिससे अनन्त मनुष्य ने अपने आत्मा मे विराजमान परमात्मा के सक्षात दर्शन पाकर सोमरस रुपी प्रसाद को चखने का शौभाग्य पाकर खुद को धन–धान्य महसूस किऐ । वही उर्जा आज हम सबको भी अपने जीवन में मुक्ती के और बढने में विवश कर रही हैं और इस पवित्र भूमीको विश्व स्त्तर पर आध्यात्मिक नेतृत्व करने के लिए मार्गदर्शन कर रही हैं ।
विगत के सभी बुद्धपुरुष दृष्टा एक मायने में अधुरे थें । क्योकी जुरना, रुचना और पचना सभी के शौभाग्य में नहीं होता हैं । उन सभी ने अपने भितर के अन्नत खजाना प्राप्त कर लिया था, और उस खाजाना को लोगो के बिच फैलाने की बहुत चाँह भी था । लेकिन उन सबके पास उस शान्ति के सन्देशको अधिक से अधिक जनमानस तक पहुँचाने की भरपूर श्रोत साधन की बहुत अभाव था । अष्टाबक्र, जनक, बुद्ध, महाबिर, कबिर जैसा बुद्धपुरुष अपनी सामथ्र्य से जहाँ–जहाँ तक जा सकता था, वहाँ तक अपने सन्देश को फैला सका ।
इसी वजह से उन सभी के शान्ति का सन्देश मिथिला भूमी तक ही सिमित रह गया । इसके लिए भी नजाने कितने नासमझ से अनन्त दुःख झेलना पडा । क्योकी धर्म के ठेकेदार और उसके दलाल कभी भी किसी को अपने पैर पर खडे नहीं होने देना चाहता हैं । हमेशा लोगो के बैषाखी बना रहना चाहते हैं, और बैषाखी बेचकर अपनी दुकनदारी चलाकर रोजी–रोटी के उपाय करता रहता हैं । लेकीन सन्त हमेशा पैर की बात करता हैं । उनका कहना होता हैं, “तमु अपना पैर ठिक करलो, जिससे तुमको चलने के लिए किसी की भी जरुरत न पडें, आखिरकार मेरे भी” । इसी अभिव्यक्ती के भिन्नता के कारण आजतक साधु–सन्त और धर्म के ठेकेदार और उनके दलाल के साथ कभी भी एक साथ नहीं बन पाया हैं ।
"भगवान राम अपने गुरु बशिष्ट के अज्ञानुसार अपनी भाइयो के साथ विबाह से पूर्व मिथिला भूमी जनकपुरधाम में आकर इस बिराट पन्द्रह दिवसिय परिक्रमा साधना शिविर में एक साधक के रुप में सहभागी हुवा था, जिस शिविर का नेतृत्व सदगुरु राजर्षी जनक स्वयंम ही करते थें । लेकीन, भगवान राम अपनी गहन तपस्या और लगन सें साधना शिबिर के बिच में ही कन्चनबन में बुद्धत्व प्राप्त कर चुका था । इसलिए, भगवान राम के साथ सभी साधक कन्चनबन में हीं होली पर्व से पहले ही होली महोत्सब मना चुका था । आज भी मिथिलाबासी परिक्रमा समाप्त होने से पहले हीं कन्चनबन में होली महोत्सब मना कर भगवान राम के संबोधी दिवस मना रहे हैं ।"
दुसरे मायने में; आज से पहले सभी सदगुरु अपने समय से पहले इस पृथ्वी पर आ चुके थें । कृष्ण पाँच हजार वर्ष पहले, बुद्ध पच्चिस सौ वर्ष पहले और कबिर सात सौ बर्ष पहले इस धरती पर आ गए थे । उसको पहचाने बाले बहुत न्यून बिरला ही लोग थे । आज विज्ञान भरपूर स्रोत साधन उपलब्ध कर दिया हैं । और मनुष्य की चेतना मानने से जानने के और अग्रसर हो रहा हैं । आज कोइ समाधिष्ट बुद्धपुरुष सदगुरु अपने शान्ति के सन्देश को एक बन्द कमरा में सिमित होकर कुछ ही समय में संसार भर में पहुँचा सकता हैं । इसलिए मुझे आज के समय को सतयुग के रुप में घोषणा करना तनिक भी संकोच नहीं हैं ।

सदगुरु साधक की अन्तस चेताना को जगाने के लिए उसके अन्तर और बाहरी रुप से विभिन्न प्रयोग से गुजारता हैैं । जिससे की साधक सिघ्र ही अपनी मुकाम हासिल कर सके । इसी प्रकार राजा जनक अपने सदगुरु अष्टावक्र से आत्मज्ञान पाकर संबोधी को उपलब्ध हुऐ । तब जनक ने अपने ही मिथिला राज्य के राजधानी इस जनकपुरधामको तपसथली (आश्रम) बनाया और उसी अनुसार के संरचना निर्माण किया था । इसी शिलशिला के एक अयाम मिथिला परिक्रमा हैं ।
राजर्षी जनक के समय अधिकाशं साधक गृहस्थ होते थे । उसके लिए अपने घर–परिवार में रहकर और अपने घर–परिवार छोडकर अपनी अन्र्तयात्रा कर पाना बहुत मुश्किल होता था । इसके लिए गृहस्थ साधक अपने व्यस्त दिनाचार्या मे से कुछ समय हप्ता, दो हप्ता, महिना, दो महिना और तिन महिना निकाल कर अपनी अन्तस्थल के भितर उस परमानन्द में डुबकी लगाना चाहते थे और उनके सदगुरु की निर्देशन भी था । इस क्रम में राजा जनक १५ दिनका साधना शिविरका आयोजन किया करता था । जिस में अपने साधक के साथ विभिन्न जगह पहुँच कर उसके साधना के गहराई में पहुँचाने के कोशिश किया करते थे, साथ ही नए लोगो को सत्य के राह में चलने के लिए उत्पे्ररित किया करते थे ।
आध्यात्मिक रुपान्तरण के लिए सदगुरु साधक के तिन तल से यात्रा करबाते हैं । एक हैं; शरिर, जिसमे शरिर के विभिन्न अंग और उससे की जाने बाले क्रिया के प्रति होशपूर्ण सजगता को साक्षी भाव से अनुभव करना । दुसरा हैैं; हमारा मन, जहाँ चल रहे विभिन्न बिचार के संवेदनशिलता उपर साक्षी भाव कायम रखना । तिसरी हैं; हमारी स्वाँस, जो हमारी शरिर और मन के सेतु को जोड के रखा हैं । सदगुरु राजर्षी जनक भी अपने इस पन्द्रह दिन के परिक्रमा शिविर में मनुष्य के तिनो तल के प्रक्रिया से गुजारता था ।
सुबँह के ४ः०० से ७ः०० बजे के बिच ब्रहममूर्त में साधक को अनापानसती योग और विपाष्ना का ध्यान करवाते थे । जिस प्रयोग मे साधक अपनी पसन्द के आसन में बैठ कर बाहर के दोनो आँखे बन्द करके अपनी आती–जाती स्वाँस को देखते रहना होता हैं । जैसे ही साधक स्वाँस के प्रती सजग होते ही, उसकी स्वाँस बहुत धिमी हो जाती हैं । जब स्वाँस शान्त हो जाती हैं तब अपने शरिर के विभिन्न अँग में हो रहे संवेदना को देखते रहना होता हैं । धिरे–धिरे गहन अभ्यास के बाद स्वाँस और शरिरको शान्त हो ते ही साधक अपनी मन के विचार के संवेदनशिलता प्रति बिना कोइ राग और द्धेश से साक्षी भाँव से देखते–देखते अपने नाशबान शरिर और मन के पार अविनाशी आत्मा को जानकर अपने अन्तर के विभिन्न बिकार से पार होकर आत्मज्ञान प्राप्त कर के पूर्ण विश्राम को उपलब्ध हो जाते हैं ।
इसी प्रकार सदगुरु जनक अपने साधक के साधना के और गहराइ में उतारने के आन्त्रिक साधना के शिवाय बाहरी रुप सें भी अनेक प्रक्रिया से गुजारते थे । जब साधक पन्द्रह दिन के परिक्रमा शिविर में अपने घर–बार छोड कर सन्यासी की तरह जीवन जिते थे । उस दौरान सभी वर्ग के समुदाय के साथ मिलजुल कर अपनी अति आवश्यक जरुरत पूरा करते हुऐ बाहरी कार्य के प्रति भी साँक्षी की साधना जारी रखते थे । इन पन्त्रह दिनो में एक सराए से अगले सराऐ तक पैदल ही यात्रा किया करते थे ।
यात्रा के दौरान अपनी बाँयी पैर उठाते वक्त भितर आती हुई स्वाँस और जमिन पर पैर रखते समय बाहर जाती हुई स्वाँस पर ध्यान जारी रहता था । १५–२० मिनेट के अन्तराल में ठहर कर खुद को साँक्षी भाव से देखते रहना होता है । ऐ ! प्रक्रिया एक सराऐ से दुसरे सराऐ तक पहुँचते हुवे जारी रहता हैं ।
दिन भर के यात्रा से थके होने के वजह सें शाम में स्नान करके किर्तन और संगित के माध्यम से ध्यान में और गहरी डुबकी लगाकर रात्री बिश्राम में चले जाते थे । यही प्रक्रिया १५ दिन तक लगातार जारी रखने सें साधक के भितर अदभुत परिणाम महसूस कर पाते थे । १५ दिन के परिक्रमा साधना शिविर के पश्चात साधक अपने घर–समाज मे ही रहकर कुछ समय ध्यान और बाँकी समय अपनी दिनाचार्या के कार्य करते हुऐ भी साक्षी की साधना जारी रखता था । जिस से इस प्रक्रिया के निरन्तरता जारी रखने से साधक को अनायास परम विश्राम की अवस्था उपलब्ध हो जाते हैं ।
इसी परम विश्राम के अवस्था को संबोधी, समाधी, निर्वाण और बुद्धत्व आदी जैसा अनेको पार्यावाची नाम से संबोधन किया करते हैं । इसके बाद की अवस्था को प्रकट कर पाना हमारी शब्द और भाषा असर्मथ हैं । ऐ, गुँगे की गुड हैं । अगर कोइ गुँगे से आम के स्वाँद पुछे तो मुँह से मुस्कान के साथ हुँ हुँ कर के दुसरो से पला छुडा लेना चाहेगा । जो कह नहीं सकता सिर्फ अनुभव कर सकता हैं । आजतक जिसने भी उस अनुभव की बात करना चाँहा वो खुद उलझ गऐ है और अन्य लोगो को भी उलझा कर के उस परम आनन्द की महिमा को और कम कर दिया है । कोइ भी किसी मनुष्य कें अन्तर कें आध्यात्मिक खाजाना का अनुभव नहीं करा सकता हैं । उसके लिए मनुष्य को स्वंयम यात्रा करनी होती हैैं । सच्चा सदगुरु सिर्फ मार्गदर्शक हो सकता हैं ।
कोइ भी कार्य अकेले करने के बजाय समूह में किए जाने से उपलब्धि बहुत सहज और सरल हो जाते हैं । क्योकी सारे लोगो के यात्रा एक ही दिशा में होने के वजह से कम सामथ्र्य बाले लोगो की यात्रा भी सफल हो जाता हैं । जो कुछ लोगो के लिए अकेले यात्रा करना मुश्किल ही नहीं असम्भव हो जाते हैं । जैसे कुछ २५–३० लोगो के जमात समूह में नदी तैरता हो तो एक दो लोग कम तैरने बाले भी उन सारी लोगो के साथ नदी पार कर जाते हैं । दुसरी बात; हम जैसे लोगो और स्थान पर होते हैं, वैसा उर्जा हमे आकर्षिक करते रहते हैं ।
कितना भी कामुक अशान्त लोग हो, मन्दिर, मस्जिद में जाते हीं कुछ पल के लिए शान्ती महसूस करेगा । इसी प्रकार कितना भी ब्रहमचय साधक हो । अगर बेश्यालय और मदिरालय के पास से गुजरते वक्त कुछ समय के लिए अपने आपको कामुक महसूश करेगा । इसको आध्यात्मिक भाषा में आभामंडल (औरा) कहते हैं । इसिलिए, बुद्ध अपने दस हजार भिक्षुवो के सँग एक साथ यात्रा किया करते थे । जब बुद्ध दश हजार भिक्षुवो के साथ किसी गाँव से गुँजरते थे तब उस गाँउ के लगायत आसपास के स्थान में शान्ति की लहर छा जाती थी ।
अन्र्तगृह परिक्रमा
जो लोगो अपने दिनाचार्या में से १५ दिन के समय एक साथ नहीं निकाल पाते थे । उन सभी लोग परिक्रमा मे अन्तिम दिन जनकपुरधाम के अन्र्तगृह परिक्रमा में १५ दिन के साधना शिविर पूरा करके आए हुऐ साधक के साथ परिक्रमा में सामील हो कर अगले दिन उन व्यक्ति के साथ होली खेल कर उस आनन्द के रस को चखने की कोशिश करते थे ।
जो उन सभी लोगो ने १५ दिनो के गहरी साधना सें हासिल किया होता हैं । कुछ लोग के पन्द्रह दिन के गहरी साधना से उपलब्ध उपलब्धियाँ कुछ लोग एक ही दिन में उपलब्ध हो जाते थे । इसके लिए उसकी पूर्व जन्म की संचित साधना और इस जन्म की विवेक पूर्ण समझदारी सहायक होता हैं । इस अन्र्तगृह परिक्रमा में भीं जगह–जगह पर सराऐ के तरह ठहराब बनाया गया था । जो आज मन्दिर के रुप लिया हैं । जिस तरह १५ दिन के साधना शिबिर के साधक हर रोज किया करता था ।
वो सारी रिबाज अन्र्तगृह परिक्रमा में सुबह ध्यान के बाद परिक्रममा में अपनी बाँयी पैर उठाते वक्त भितर आती हुवी स्वाँस और जमिन पर पैर रखते समय बाहर जाती हुई स्वाँस पर ध्यान जारी रहता था । चलते–चलते कुछ समय के बाद रुकने के लिए बनाए गए जगह पर खुद को साँक्षी भाव कायम रखते हुऐ अन्र्तगृह परिक्रमा पुरा करते थे । शाम में किर्तन पुजा–पाठ और ध्यान करके विश्राम करके अगले दिल उनही साधक के साध होली मनाके अपने आपको आध्यात्मिक रुप से तजो ताजा करके साधना में नयीं संकल्प से जोग जाँगर के साथ पुनः प्रति दिन साधना में जुट जाते थे ।
होली महोत्सब
त्रेता युग में दैत्य का राजा हिरण्यकश्यप का भाई हिरण्याक्ष ऋषी–मुनी,साधु–सन्त और देवी देवता के बहुत उपद्रब कर रहे थे । जब कोइ भी मनुष्य सत्य के खोज में निकलता हैं तब संसार के हर तरह के राक्षष जैसा लोग उनके खिलाप खडा हो जाते हैं । लेकीन भगवान हमेशा सत्य के पिपासु को मार्गदर्शन के साथ संरक्षण करते रहते हैं । भगवान बिष्णु बराह अवतार लेकर हिरण्याक्ष का बध किया । हिरण्यकश्यप भगवान विष्णु से अपने भाई के मृत्यु के प्रतिशोध लेने के लिए भगवान शिव के तपस्या मे चले गए ।
तपस्या से मनुष्य कोइ भि चिज प्राप्त कर सकता हैं । ऐ ! भी नहीं हैं; की संसार के सभी लोग परम सत्य सम्बोधी के लिए ही तपस्या करते हैं । अकसरहा लोग संसारी क्षँणभँगुर चिज ही पाने के लिए देवी देवता के उपाषना अराधना लगायत भगवान के तपस्या करते हैं । जो चिज संसारी रुप से पाना अस्मभव लगता है । उसके लिए अलौकिक शक्ति के सहारा लेने के लिए पहुँच जाते हैं । लेकीन अस्तित्व की बिराट लिला हैं । मनुष्य गहरी निष्ठा और संकल्प से जो पाना चाहता हैं एक न एक दिन पा ही लेता हैं । अगर किसी ने नहीं पा सका हो तो उसकी प्रयास में हीं कमी रही होगी । हिरण्यकश्यप सात साल के अपनी गहन तपस्या सें भगवान शिव सें अमरता का बरदान प्राप्त कर लिया ।
मनुष्य जिस प्रयास से अपना सुनहरा भाग्य निर्मित कर सकता हैं । दुर्भाग्यबश वही मनुष्य अहंकार के वजह से अपनी बिनास कर बैठता हैं । इस सात साल के गहन साधना से हिरण्यकश्यप परमात्मा को पाकर आबागमन से मुक्त हो सकते थे । लेकीन उसने अपनी शर्मनाक मौतका द्धार खोला ।
जब हिरण्यकश्यप तपस्या के लिए निकला तब उसकी पत्नी कयाधु गर्भवती थी । कयाधु दैत्यो के राजा जम्भ की पुत्री थी । उस बच्चे को पैदा होते ही इन्द्र मारना चाहता था । नारद कयाधु के बचाकर अपने आश्रम में ले गऐ । जब हिरण्यकश्यप तपस्या से लौटें तब उनके पुत्र प्रल्हाद सात साल के हो चुके थें । प्रल्हाद अपनी माँ के ग्रभ से सात साल के उम्र तक नारद के सानिध्य में भगवान बिष्णु की भक्ति में पला बडा और छोटी सी उम्र में संबोधी प्राप्त कर चुके ।

मनोबैज्ञानिक के मुताबिक; बच्चा तिन बर्ष के उम्र तक में ७० प्रतिशत चिज सिख लेते हैैं, बाँकी जीवन भर में सिर्फ ३० प्रतिशत हीं सिखते हैं ।
आज देश और समाज में जो हत्या, हिंसा और बलत्कार जैसी घटना दिनानु दिन घट रही हैं । उसमे पती–पत्नी की शारिरीक और मान्सिक विक्षिप्त अवस्था बहुत बडी मायने रखती हैं । लगभग सभी दम्पती विक्षिप्त मनोदशा में बच्चे पैदा करते हैं ।
आज देश में एक छोटी से छोटी कलर्क के नोकरी पाने के लिए कम से कम माध्यमिक स्त्तर पर शिक्षित होना, शारिरीक रुप सें दुरुस्त होना, फौजदारी अभियोग से मुक्त होना आदी जैसा अनेकौ योग्यता आवश्यक हैं । लेकीन एक बच्चा पैदा करने के लिए कोइ योग्यता की जरुरत नहीं हैं ।
शारिरीक और मान्सिक रुप से बिमार लोग भी धमाधम बेहोसी में बच्चे पैदा कर रहे हैं । एैसी बिमार और बिक्षिप्त मनोदशा के दम्पती से स्वस्थ के साथ सभ्य नागरिक की आशा करना विल्कुल असम्भव हैं । इतने बिमार और पागल दम्पती से जन्मे हत्यारा, भ्रष्टाचारी, बलत्कारी और बिक्षिप्त मनोदशा के लोगो के बाबजुद भी दुनिया चल रही हैं । यही परमात्मा की अदभुत चमत्कार हैं । अन्यथा कब की ऐ दुनिया खत्म हो जाना चाहिए था । मेरे मायने; जब तक मनुष्य शारिरीक, मान्सिक, आर्थिक, समाजिक और आध्यात्मिक रुप से स्वस्थय न हो जाए, तब तक लोगो को बच्चे पैदा करने का अधिकार ही नहीं होना चाहिए ।
उसके लिए आवश्यक पहचान–पत्र आवश्यक हैं । जो आज के बैज्ञानिक युग में सम्भव हैं । आज तत्काल वर्तमान समस्या हत्या, हिंसा, बलतकार, भ्रष्टाचार आदी जैसा घिनौना हर्कत के समाधान के लिए सभी बच्चो को उनकी माँ–पाप से दुर कर देना चाहिए । जिससे बच्चा और संक्रमित होने से थोडा बच सके ।
जब हिरण्यकश्यप अमरता के बरदान प्राप्त करके अपनी घर लौटा तब खुद हीं भगवान घोषणा कर दिया । अपने पुत्र प्रल्हाद से भी अपनी भगवान होने के गवाही लेना चाँहा । लेकीन उनके लाख मनबाने से प्रल्हाद ने भगवान विष्णु के सिवाय अपने पिता को भगवान मान्ने मे अस्विकार करता हीं रहा । हरिण्यकाशिपु अपने गुरु शुक्राचार्य के पुत्र शंद और अमर्क को अपनी बात मनवाने के लिए आदेश दिया । शंद और अमर्क प्रल्हाद को साम, दाम, दण्ड, भेद की शिक्षा देने के बाबजुद भी अपनी कोशिश मे नाकाम रहा ।
हिरण्यकश्यप अपनी सारी प्रयास के असफलता से आखिरकार प्रल्हादको मार देना ही उचित समझा । उसके लिए नानाथरी के उपाय अपनाया । उचे से उचे पहाडो से गहरी से गहरी खाई में फेकना, पागल जंगली हाती से कुचलबाना, बिष देना आदी जैसा प्रयास असफल होने से अन्त में आग से नहीं जलने की बरदान प्राप्त अपनी बहन होलिका को गोद में रखकर आग में जलाकर भष्म कर देने का अज्ञा दिया । “जा को राखे साइया मार सके न कोई ” जिसके रखबाला स्वंयम जगत के रचैता हो जाता हैं । उसको दुनिया के लोग क्या बाल बाँका कर सकेगा ।
आखिरकार आग में होलिका स्वँम जलकर भष्म हो गयी और प्रल्हाद सही सलामत रह गया । होलिका हमारी काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार की प्रतिक हैं । जब साधक अपनी साधना रुपी आग सें अपने काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार रुपी होलिका को भष्म कर देता हैं । तब साधक प्रल्हाद जैसी सम्बोधी की अवस्था उपलब्ध हो जाता हैं । यहाँ पर प्रल्हाद संबोधी, समाधी और निर्वाण अवस्था के प्रतिक हैं ।
एक बहुत चर्चित कहाबत हैं, “बिनाश काले बिपरित बुद्धी” अहंकार मनुष्य की बुद्धी भ्रष्ट कर देती हैैं । इतनी सारी घटना घटने के बाबजुद भी हिरण्यकश्यप को समझ नहीं आया और–और अनेको दुशचक्र रचते रहे । आखिरकार भगवान विष्णु नर्सिङ्ग अवतार लेकर भगवान शिव के बरदान को सलामत रखते हुवे मध्यमार्ग से हिरण्यकश्यप का बँध किया । इसी असत्य के उपर सत्य के बिजय होने के उपलक्ष्य मे होली का महोत्व मनाते हैं । जिस में एक दिन पहले होलिका दहन करके सभी लोग अपने–अपने राग, द्धैष और पूर्वाग्रह को छोड कर एक आपस में मिलजुल कर विभिन्न रङ्ग से होली खेलते हैं । और एक दुसरे को सुस्वासथ्य और प्रगती की कामना करते हैं ।
राजर्षी जनक के समय काल में उस समय के सारे सदगुरु अपनी शिष्य के शिक्षा समाप्त हो जाने के बाद उसकी अन्तिम परिक्षा के लिए सदगुरु जनक के पास भेजते थे । इसी क्रम में भगवान राम अपने गुरु बशिष्ट के अज्ञानुसार अपनी भाइयो के साथ विबाह से पूर्व मिथिला भूमी जनकपुरधाम में आकर इस बिराट पन्द्रह दिवसिय परिक्रमा साधना शिविर में एक साधक के रुप में सहभागी हुवा था, जिस शिविर का नेतृत्व सदगुरु राजर्षी जनक स्वयंम ही करते थें ।
लेकीन, भगवान राम अपनी गहन तपस्या और लगन सें साधना शिबिर के बिच में ही कन्चनबन में बुद्धत्व प्राप्त कर चुका था । इसलिए, भगवान राम के साथ सभी साधक कन्चनबन में हीं होली पर्व से पहले ही होली महोत्सब मना चुका था । आज भी मिथिलाबासी परिक्रमा समाप्त होने से पहले हीं कन्चनबन में होली महोत्सब मना कर भगवान राम के संबोधी दिवस मना रहे हैं ।
परिक्रमा साधना और होली समाधी के अवस्था हैं । बाहरी होली के रङ्ग कुछ पल के लिए हैं । लेकीन भितर के होली के रङ्ग मनुष्य के साथ हमेशा रहता हैं । होली में लाल, सफेद, पिला, हरा, निला रङ्ग इस्तेमाल करते हैं । लाल सहास के , सफेद पवित्रता के, पिला आनन्द के, हरा पे्रम के और निला शान्ति के प्रतिक हैं । जिसको अपने भितर परमात्मा के साथ होली खेलने का शौभाग्य मिल चुका हैं । उसके लिए साल में कोइ खास दिन की हीं इन्तजार नहीं रहता हैं ।
उसके जिन्दगी की हर एक क्षण होली होता हैं । जब भी समय मिले कुछ पल के लिए आँख बन्द करके अपने भितर दिब्य आलोक में डुबकी लगाता रहता हैं । उस व्यक्ति से सदा पवित्रता, सहास, पे्रम, आनन्द और शान्ति बहता रहता हैं । प्राचिन काल में इसी सन्देश के कहानी के जरिए जनमानस में प्रसारित करने की कोशिश किया गया हैं ।
युगो–युगो के पश्चात समय बदला, स्थिती बदला, परस्थिती बदला, बोलने बाले बदले, बोलने बाली भाषा बदली और सुनने बाले बदले । इतनी बदलाब के बाबजूद पवित्र आत्म रुपान्तरण के पन्द्रह दिवसिय पक्रिमा साधना शिविर नासमझ धर्म के ठेकेदार और उनके दलाल के हात में पर के बिकृत होकर अपनी मौलिकता खो बैठी हैं । और कर्मकाण्ड, रितिरिवाज, परम्परा बनकर संसारी तुच्छ चिज माँगने बाले भिखमँङ्गे के भिख माँग्ने के अड्डा बन कर सिमित हो गया हैं । जिस की पुर्नजागरण और उजागर करने के लिए आप सबकी योगदान की अति आवश्यक हैं ।
अन्तः मै आप सभी का बहुत अनुग्रहीत हु, आप सभी ने मेरे को अभी तक सँग साथ दिया । मै परमात्मा से गुजारिस करता हूँ, आपकी जीवन की हर एक क्ष्ाँण में यश, ऐश्वर्य, उन्नति, आदर्श, कीर्ति, विकास, सुख, समृद्धि, बैभव, स्वास्थ्य, प्रसिद्धि एवं अपार सुशियाँ के साथ आजीवन अपने जीवन पथ पर गतिमान कायम रखते हुवे परिक्रमा के पराक्रम से होली महोत्सब की और यात्रा करने का शौभाग्य प्राप्त हो । यही कामना के सँग महान पर्व होली की ढेर सारी शुभकामनाएं और बहुत–बहुत बधाईया ........। धन्यवाद ! मेरा प्रणाम स्वीकार करे ।
लेखक : “जिवन दर्शन” आध्यात्मिक जन–जागरण अभियान के आध्यात्मिक अभियन्ता है ।

















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