बर्षात--------
नाचैत ए धरती, मेंघक गर्जनसँ धून, छन-छन करैत बरसात, झुमि उठल आसमान आर तिनु लोकक संगहि बसात।। --------- बर्षा मे हरियाइत धरती सुखा पड़ल छल अखार, ब र'ख धरि सँ पियासली धरती, कयने छली इन्तजार।। ------------------------ अहिंक संग पिबने रहि कहियो हम बरसात में, बरखो बितल मुदा उतरल नहि नशा कुनो राति में।। ---

२०७४ माघ ११ बिहीबार, बिहान ८:५० बजे१ मिनेट पढाइ

नाचैत ए धरती, मेंघक गर्जनसँ धून, छन-छन करैत बरसात,
झुमि उठल आसमान आर तिनु लोकक संगहि बसात।।
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बर्षा मे हरियाइत धरती सुखा पड़ल छल अखार, ब
र'ख धरि सँ पियासली धरती, कयने छली इन्तजार।।
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अहिंक संग पिबने रहि कहियो हम बरसात में,
बरखो बितल मुदा उतरल नहि नशा कुनो राति में।।
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नदी, नहर'क पानिक बहाव सँ निकलई मधूर धून,
बरखा मे भिजैत- कठुवाइत चिरयक चून मून चून।।
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अहि घनघोर बर्षात सँ दहा गेल जीनकर झोपड़ी,
उ कहतन्हि बिधनाक लिखल! यम'क लेल बहार अइ।।
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मेंघक पालकी मे भऽ सवार बर्षात उतरैत छनि जमीन पर,
जौं-जौं धरती कलपैत छनि, बर्षा नाचैत बिधनाक आधीन पर।।
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गरीब के फुटल चन्बार सँ, बर्षा केहन मजाक केलक,
इँटाक महल छोड़िकऽ गरीबक महल बहा देलक।।
#गुरु&धिरु कविता संग्रह
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