सरस्वती बंदना
या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरुपेणसंस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।। ----------------------- नतमस्तक जीनकर आगु लोक छै, जँ गुंजय विणाक श्वर'क रागनी, अहीँक विद्या सँ रोशनी दुनियाँ मे, मैय अहीँ छी हंस वाहिनी।। -------------- अहीँक विद्या सँ मैंय जानलहुं हम माता-पिता छन्हि पूजनीय, जीवन'क सब प

२०७४ माघ ११ बिहीबार, बिहान ८:४१ बजे१ मिनेट पढाइ

या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरुपेणसंस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
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नतमस्तक जीनकर आगु लोक छै, जँ गुंजय विणाक श्वर'क रागनी,
अहीँक विद्या सँ रोशनी दुनियाँ मे, मैय अहीँ छी हंस वाहिनी।।
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अहीँक विद्या सँ मैंय जानलहुं हम माता-पिता छन्हि पूजनीय,
जीवन'क सब पंक्ति मे मैंय जानलहुं हम अहीँ छी वंदनीय।।
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भटकि रहल छी बाट हम अज्ञानी, दर्शबियौथ पथ सरल,
अहीँ छी विद्या दायीनी , अहीँ छी ज्ञानक ज्योतिर्मय निर्मल ।।
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मैंय सरस्वती शत् प्रणाम,भरथिन झोली मे एहन ज्ञान,
करब देश,समाज के सेवा, पढ़ि लिख कऽ पाबी सब मान।।
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हे मैंय जन सेवा लय भक्ति दियौन्ह, देथिन काया मे शक्ति,
सत्य सँ परिचित लय जुक्ती दियौन्ह, जाति-पाति सँ मुक्ति ।।
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अनपढ़ के शिक्षित बनायब, शिक्षा के बाती जरायब,
समानता के सब साथ निभायब, सुतलाहा के जगायब।।
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ज्ञान'क बृक्ष सँ फूलय फूलवारी, सगरो होई यश अहाँक
बुध्दिआर हेतैक सब नर-नारी, दियौन्ह मैंय आशीष अहाँक ।।
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शब्द रचना✍
गुरु दयाल यदुवंशी &धिरेन्द्र पासवान सौर्य
हाल मलेसिया
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