• २०७६ कार्तिक ६ गते, बुधबार



'पुलिस प्रशासनकी गोलीका निशाना में मधेशियोंका शिर और सीना ही क्यों ?'

जानकारों का मानना हैं की नेपाली पुलिस की मधेश में होने वाली हिंसक वर्ताव नस्लीय चिंतन से परिचालित हैं । 

घटना है जून ३० का रविवार का, सर्लाही ईस्वरपुर में सरकारी लापरवाही के कारण बांके पुल की निर्माण के क्रम में बनाये गए ३० फिट के पीट के अंदर डूबकर एक १२ सालके बच्चे की मौत हो गई। इसके कारण स्थानीय निकायको दबाव देने तथा छतिपूर्ति के लिए स्थानीय वाशियों ने पूर्ब–पश्चिम राजमार्ग पर अवरोध किया। पुलिस ने वहां लोगोंको सहानुभूति देने के बजाय अवरोध नियंत्रण के नामपर निशाना साधकर गोली दाग दी, और वो गोली जाकर निहत्थे सरोज महतो के शिर पर जा लगी जिससे उनकी घटनास्थल पर ही मौत हो गयी। 

 

इस घटना को लेकर सामाजिक संजाल पर पुलिस प्रशासन की थूथू हो रही है। पुलिस की मानसिकता पर लोग सवाल उठा रहे हैं, आखिर कबतक मधेसी शिकार होते रहेंगे ? क्या पुलिस की ट्रेनिंग में मधेशियों को शिर पर गोली मारने की तालीम दी जाती है ? आखिर मधेशी देखकर पुलिस क्यों बौखला जाती है ? और, क्यों शिकारी की तरह हिंस्रक हो जाती है ? 

 

इस घटना को लेकर मानव अधिकारकर्मी भी आवाज उठा रहे हैं। मानव अधिकारकर्मी चरण प्रसाई ने कहा की ‘पिछले सालों से मधेशमे पुलिस प्रशासन द्वारा अत्याधिक बल प्रयोग की घटना बढ़ रही है। सामान्य प्रकृति के घटना मे भी पुलिसद्वारा मारे गए लोगोंकी शिर मे गोली लगी है, इससे पता चलता है की पुलिस या तो नियतवश शिरपर गोली मार रही है या नेपाल सरकारद्वारा अदक्ष पुलिस को भर्ती की गयी है ।’

 

इसी तरह मानव अधिकारकर्मी गौरी प्रधान का कहना है की ‘ऐसे घटनाओंसे मधेशमे पुलिस–प्रशासन पर असन्तुस्टि बढ़ रही है, इस मामले में प्रशासन द्वारा न्यायिक जांच कर प्रमाणित करना होगा की क्या सचमे भीड़ नियंत्रण से बाहर चली गयी थी ?’

 

वहीँ पुलिस हमेशा की तरह अपना बचाव कर रही है। प्रदेश २ के डिआईजी प्रध्युमन कार्की का कहना है की पुलिस ने भीड़ नियंत्रण के लिए १५ राउंड हवाई फायर किये। लेकिन गोली कैसे शिरपर जा लगी ? ये नहीं बोल रहे । 

 

सर्लाही के प्रमुख जिल्ला अधिकारी कृष्ण बहादुर राउत ने फिल्ड आँफिसर से पूछा है की किन के आदेश पर वहां गोली चलायी गयी ? उनहोंने इस घटना की न्यायिक छानबीन करने का वादा किया है। 

 

आपको ये भी बतादें की हाल में ही आये एक मानवाधिकारवादी संगठन ‘एडवोकेसी फोरम’ ने अपने रिपोर्ट में लिखा है की ‘तराई मधेश के समुदाय, बिशेष रूपसे मधेसी, थारू को पुलिस हिरासत में दिए जानेवाले यातना और हिंसा का दर अत्याधिक है ।’

 

इसीतरह ’ह्यूमन राइट्स वाच’ के अनुसार ‘सन २०१५ में चले लम्बे मधेश आंदोलन के दौरान ४० से अधिक मधेसी की जान चली गयी, जिसमे १५ लोग पुलिस की गोलि से मारे गए ।’

 

अब आगे देखना है, इस मामले में नतीजा क्या निकलता है। जानकारों का मानना हैं की नेपाली पुलिस की मधेश में होने वाली हिंसक वर्ताव नस्लीय चिंतन से परिचालित हैं, मधेशियों के प्रति के घृणा के कारन नेपाली पुलिस सामान्य मानवीय मूल्यों को भूल के पाश्विक एवं हिंसक कार्य करती हैं और उसे लेश मात्र भी ग्लानि महसुस नहीं होती ।

बिनोद पासवान
 

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